Friday, November 11, 2011

भारत का इतिहास सदा ही गौरव शाली रहा है . भारत का ह्रदय कहा जाने वाला हिस्सा जिसे लोग बुन्देल खंड के नाम से जानते है . याग बीरों की भूमि है जहाँ पर बुन्देली राजाओं का राज रहा है  आल्हा उदल , मलखान , ब्रह्मा , रजा परमाल , लखन, महिल, महाराजा छत्रसाल , महाराजा जुझार सिंग , महाराजा हरदौल ये सभी नाम व्पुह बीरता के लिए आज भी जाने जाते है  
    इनकी बनाई खजुराहो की कृति संसार के आकर्सनका केंद्र है 

Sunday, November 22, 2009

धर्म धारण किया जाता है

धर्म शब्द का गानहम हमेशा ही सुनते रहते है । धर्म यह कहता है, धर्म वह कहता है ।पर सच्चाई ये है की धर्म कुछ कहने सुनने की चीज नही है । धर्म की कोई परिभाषा नही है ।धर्म तो धारण किया जाता है , आत्मसात किया जाता है धर्म धारण करने पर हमारे अंदर एक आत्मविश्वास आ जाता है , जो हमे धर्म ke अनुरूप कार्य करने की शक्ति देता है । उचित अनुचित का ज्ञान करता है । धर्म और कर्म एक दुसरे के पूरक है । जहाँ धर्म प्रत्यक्ष है वहां कर्म अप्रत्यक्ष रूप से धर्म में समाहित होकर धर्म को पूर्ण करता है , जहाँ कर्म प्रत्यक्ष है वहां धर्म अप्रत्यक्ष रूप से कर्म में समाहित होकर कर्म को पूर्ण बनता है ।
धर्म तो हर परिस्थिति में एक ही रहता है । दे काल व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार कर्म बदलता रहता है । जैसे एक बिद्यार्थी का धर्म है केवल बिद्या अध्ययन जबकि दूसरी ओर उसी उम्र के गरीब मजदुर बच्चे का धर्म है म्हणत मजदूरी करके अपने छोटे भाई बहिन का पेट भरना । यहाँ धर्म नही बदला है केवल कर्म ही बदला है । दोनों ही अपना अपना धर्म निभा रहे है ।
एक और उदाहरन देखिये एक डाकू के डर से भागता हुआ एक व्यापारी साधू की jhopadi में आ कर छुप जाता है उसे विश्वास था की साधू डाकू से उसके प्राणों की रक्षा करेगा । तभी डाकू भागता हुआ आता है और साधू से पूछता है की क्या यहाँ पर कोई व्यक्ति आया है
मैंने नही देखा , साधू ने जवाब दिया
डाकू वहां से आगे चला जाता है और इस प्रकार उस व्यक्ति की जान बच जाती है ।
यहाँ पर किसी व्यक्ति की जान बचाना साधू का धर्म है उसने झूठ बोल कर भी अपने साधू धर्म की रक्षा की है । इस पर कोई बहस नही हो सकती है

Friday, November 20, 2009

युवा शक्ति को समर्पित

आज देश का हर वर्ग युवाओं की और आश की नजर से देख रहा है । औ युवा हैकी दिशा हिन् होकर भटक रहे है कारणउनका मार्ग दर्शन करने वाला कोई नही है।
युवा शब्द ही अपने आप में उर्जा से भरा हुआ है जब व्यक्ति युवा होता है, तब उसे साडी दुनिया एक तिनके जैसी हलकी नजर आती है, पहाड़ सी समस्या भी छोटी नजर आती है , उसका मन विश्वास से भरा होता है ।
बस उसके अन्दर की उर्जा को दिशा देने की जरुरत होती है ।
बहुत पाहिले की बात होती थी की पन्द्रह साल की उम्र बाल विवाह होते थे और जब तक युवा बीस साल का होता था तो उसके दो, तीन बच्चे हो जाते थे और उसका सारा ध्यान अपने परिवार की ओर केंद्रित हो जाता था । इस प्रकार उसकी उर्जा बाँट जाती थी ।
परन्तु अब समय बदल गया है , आज शादी तीस साल के बाद होती है , तो जो बीस से तीस के बीच कासमय है वाही समय सबसे ज्यादा उर्जावान होता है इस समय युवाओं को कोई नाकोई दिशा की जरुरत होती है जहाँ वह अपनी उर्जा को खर्च कर सकें । इस समय उनके अन्दर एक जोश होता है,उमंग होती है ,उनके अंदर फौलाद की ताकत होती है , इरादों ko पुरा करनेका विश्वास होता है , कु करने का जूनून होता है आपने देखा होगा की इस समय कुछ बच्चे अपने कैरियर की ओर मुद जाते है औरअपनी साडी शक्ति अपना लक्ष्य पाने में लगा देते है , कुछ राजनैतिक हाथों में पड़ कर मुद जाते है कुछ ग़लत आदतों में पड़ कर उधर मुद जाते है ।कुछ स्वार्थी तत्व उनका गलत स्तेमाल भी करते है और सबसे बड़ी बात ये है की ये जिस काम को हाथ में लेते है, उसे पूरी क्षमता और पूरी ईमानदारी से अपने लक्ष्य तक पहुंचाते है । इनकी निर्णायक क्षमता त्वरित होती है । किसी भी देश की सेना में युवा का महत्व इसी लिए होता है की वह आगे बदना जानता है ।
कहने का तात्पर्य यह है की इस समय इन युवाओं को उचित मार्ग दर्शन की जरुरत होती है । हम सभी को युवा शक्ति को पहिचानना होगा , उनका विश्वास करना होगा , उनको जिम्मेदारी देकर उनको आगे करके हमें उनके पीछे रह कर उनकेसहयोग करना होगा । मेरा विश्वास है की ये बहुत अच्छे नेता , मार्ग दर्शक , बिचारक , देश प्रेमी , रक्षक , देश को चलाने वाले , और बहुत अच्छे नागरिक बन सकते है जिस पर हम सभी को गर्व होगा ।
वह दिन दूर नही जब इस देश के हेर क्षेत्र में युवाओं की भागी दरी होगी ।

युवा शक्ति को समर्पित जय माता दी

Monday, November 2, 2009

इश्वर की माया

इश्वर की माया बहुत विचित्र है वह हर पल मनुष्यों की परीक्षा लेती रहती है .इश्वर और मनुष्यों के बिच वाही एक पर्दा है जो जीव की परमात्मा से दूर करके डंके रहता है । माया तरह तरह के प्रलोभन दे कर जीवको भटकने पर मजबूर करती है । और प्राणी उन्ही सब में उलझ कर जन्म जन्म तक भटकता रहता है । उस परम तत्व तक पहुँच ही नही पता है .जो प्राणी अटल निश्चय वाला होता है वह इन सबको पर करके अपनी आत्मा को प्रबल बना कर उस परमात्मा को पता है ।
जीवन में आने वाली परेशानियाँ हमारी परीक्षा के लिए आती है जो परीक्षा पास कर लेता है वह समझो उसके समीप आता जाता है । आप यह भी जानो की जिस पर भगवन दया करते है उसी की परीक्षा भी लेते है । कुंती ने भगवान से साडी जिन्दगी का कष्ट माँगा था ताकि वह हमेशा भगवन को याद रखे .और भगवन भी उसकी खबर रखे रहे । परेशानी में ही सच्ची पर्व्ख होतीहै चाहे वह मित्र हो , पत्नी हो , भाई हो या एनी कोई भी ।
इसीलिए हमको जीवन में आने वाली परेशानियों से डरना नही चाहिए बल्कि उनका डट कर मुकाबला करना चाहिए .

Wednesday, October 14, 2009

करवा का पूजन


करवा की पूजा करती हुई suhagine

Thursday, October 8, 2009

करवा चौथ पर उपहार

करवा चौ थ पर हर पति के द्वारा अपनी पत्नी को कुछ न कुछ उपहार अवश्य दिया जाता है । यह अपनी सामर्थ्य के अनुसार होता है । यह बात हमेशा ध्यान देना चाहिए की उपहार की कीमत नही देखि जाती बल्कि उपहार देने वाले की भावना को देखना चाहिए , उसका स्नेह और प्रेम देखना चाहिए ।
अलग अलग प्रान्तों में यह त्यौहार कुछ अलग तरीके से मनाया जाता है परन्तु उसका भावः एक ही रहता है ।

Tuesday, October 6, 2009

करवा चौथ का व्रत

आज करवा चोथका व्रत का दिन है । यह व्रत कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है । यह व्रत सुहागी स्त्रियाँ अपने पति की सलामती के लिए करती है । प्रातकाल ही उठकर स्नान करके सारा दिन निर्जला ( यानी की पानी भी नही पिया जाता है )रहते है । फ़िर रित को चाँद के निकलने पर उसकी पूजा करके उसको अर्ध देकर पति के दर्शन छन्नी में से करके पति के हाथ से पानी पि कर यह व्रत खोलती है । यह व्रत बहुत कठिन है ।
यह व्रत सत्यवान की लम्बी आयु के लिए सावित्री भी ने किया था , अपने पति की रोग मुक्ति के लिए यह व्रत रानी मदालसा ने भी किया था । अपनेपति को कुष्टरोग से मुक्ति दिलाने के लिए यह व्रत सती नर्मदा ने भी किया था जो महा सती अनुसुइया की सहेली थी उनहोंने ही यह व्रत करने की सलाह दी थी। रानी चंचला का उनके पति ने परित्याग कर दिया था फ़िर सप्त ऋषि कहने का तात्पर्य है की इस व्रत की बड़ी महिमा बताई गई है ।
व्रत का विधान --- (0इस दिन स्र्तियों को सोलह शंगार करके तैयार hona चाहिए )-दो करवा या लोटा , एक थाली , उसमे पूजा की सारीसामग्री, सुहाग का सारा सामान , फ़िर शाम को घर के आँगन या छत पर आता से चौक पुर कर उसमे दोनों करवा को रखकर एक करवा में जल भरे और दुसरे करवा मेंलड्डू , भजिया ,चावल , पुडी , सबकुछ से भरना चाहिए फ़िर फ़िर गौरी माता और गणेश जी की की पूजा करना चाहिए फ़िर चाँद निकलने पर एक कटोरी में दूध लेकर दोनों हाथ से चाँद को दूध के छींटे दे और ये बोले की चन्द्र देव अर्ध लो, हमको सुहाग दो । एसा पञ्च बार करे फ़िरपानी से जल का अर्ध दे और एक छन्नी में जलता हुआ दीपक रखकर उसमे से चाँद के दर्शन करे और उसी छन्नी में से अपनेपति के दर्शन करे उनके टिका लगाये , पुर छुए और उनके द्वारा अपनी मांग में सिन्दूर लगवाये फ़िर पति के हाथ से पानी पीकर अपना व्रत खोलेफ़िर पति की माँ यानि की सासु माँ को पति के साथ में जो भी भेंट आप दे सकते हो जरुर दे चाहे वह एककपड़ा ही क्यों नहो इस व्रत में सासु माँ को भेंट देने का बहुत महत्व है व्रत तभी पूर्ण होता है । माँ को भेट देते समय जब आप पैर पड़ने को झुकते है तब माँ अपना आचल बेटे बहु के सर पर रखकर उनको सदा सुहागन रहने का आशर्वाद देती है .इसके बाद सभी मिल जुल कर कहना पीना खरे है ।

Wednesday, September 9, 2009

गणेश chturthi का महा पर्व


गणेश chatirthi का महा पर्व हमारे देश me bhut धूम से

Tuesday, June 23, 2009

मुख्य त्यौहार

हमारे देश में अनेकों त्यौहार मनाये जाते है । पर मुख्यतया निम्न हैं
होली ----- यह रंगों का त्यौहार है जो मार्च माह में आता है । इस दिन हम आपसी बुराईको भूल कर आपस में गले मिलते है । यह आपसी भाई चारा और बुराई पर सच्चाई की जीत का त्यौहार है। यह शूद्रों का पर्व मन जाता है ।

गुडी पडवा ---यह पर्व चेत्र मास की शुक्ल पक्ष की परमा यानि की प्रथम दिन मनाया जाता है ।
कहा जाता है की इस दिन ब्रह्म जी ने संसार की रचना की थी । लोग एक दुसरे को नव वर्ष की बधाई देते है ।

रक्षा बंधन ----यह पर्व अगस्त मास में श्रावण मास ki पूर्णिमा को मनाया जाता है । यह भाई बहिन का त्यौहार है इस दिन बहिन भाई की कलाई पर रखी बंधती है और भाई जीवन भर उसकी रक्षा का बचन देता है । ब्रह्मण लोग भी रक्षा सूत्र बंधते हैं । इसी लिए यह मुख्यतः ब्राह्मणों का पर्व है ।

दशहरा ---- यह सच्चाई की जीत का त्यौहार है यह मुख्यत क्षत्रियों का पर्व है । इस दिन वे अपने हथियारों का पूजन प्रदर्शन करते हैं ।

दीपावली ----इस दिन हम सभी अपने घरों की सफाई करते है और दीपमाला से घर को रोशन करते है कहा जाता है की माता लक्ष्मी जी आज के दिन घर पर आती है । इसी लिए हम गणेश , लक्ष्मी जी और माता सरस्वती जी की पूजा करते है आज ही के दिन राम जी वनवास से घर अयोध्या वापिस आए थे । वेसे यह पर्व दीवाली से दो दिन पहिले यानि की धन तेरस , नर्क चौदस , दीवाली , अन्नकूट और पांचवे दिन भाई दोजके रूप में मनाया जाता है । इस दिन अपने बही खाता का पूजन बैश्य लोग करते है । इसी लिए इसे बैश्योंका पर्व कहते है । यह नवम्बर मास में मनाया जाता है ।

हमारे त्यौहार

वैस h

Sunday, June 21, 2009

हमारे मुख्य त्यौहार

जनवरी के महीने में१४ जनवरी को महा संक्रांति का पर्व मनाया जाता है । यही एक एसा त्यौहार है जो तारीख से मनाया जाता है बाकि सब हिन्दी महीने की तिथि से मनाये जाते है। यह एसा समय होता है जब सूर्यउत्तरायण हो जाता है । इस कल में म्रत्यु पाने को भीष्म पितामह ने छ माह तक बाणोंकी शय्या पर पडे रह क्र इंतजार किया था ।दक्षिण भारत में इसे पोंगल के नाम से मनाया जाता है । पंजाब क्षेर्तमें इसे लोहडी के नाम से मनाया जाता है .

Thursday, June 18, 2009

भारत की झांकी

भारत एक विविधता का देश है जहाँ सभी धर्म और जातिके लोग निवास करते है । आपसी भाई चारे की मिसाल भारत में ही देखने को मिलती हे । यह वो देश है जहा लोग पत्थर से भगवान को प्रकट करते है .यानि की पत्थर भी पूजे जाते है । नदीयों को भी माता का दर्जा दिय जाता है यहाँ पेडोंकी भी पूजा होती है , यहाँ आकाश , वायु , जल के स्त्रोत , अग्नि , प्रथ्वी , और उस पर उगी वनस्पति यानि की प्रकृति के सभी रूपों की पूजा भिन्न भिन्न रूप में होती है । हम इन सभी में उस परम सत्ता के दर्शन करते है ।माता पिता , गुरु , या अपने से बडों में भी हम उसी को देखते है। सर्प , गाय , हाथी ,बैल , शेर , चूहा , बदक ,हंस , मोर , आदि की पूजा करते है अर्थात्र इश्वरसर्व व्यापी है , सभी रूपों में है। हम किसी भी रूप में उसे माने वह हमे स्वीकार क्र लेता है । वः मन्दिर ,मस्जिद , गुरुद्वारा , चर्च , घर आंगन , बहर भीतर, उपर निचे ,खेत बाग, अमीर गरीब, हममे तुममे सबमे है ।
जिस प्रकार वह इश्वर प्रकृति के हर रूप में है ठीक उसी प्रकार भारत देश अपने विभिन्न रूप से हर भारत वासी में है । यही हमारा भारत है, जो एक गुलदस्ता है , एक गागर में भरा हुआ सागर है ।
जिस पर हर भारत वासी को गर्व है

Tuesday, June 16, 2009

हमारे द्वारा दिया गया अन्न जल पितरो को कैसे मिलता है .

मरने के बाद जिव की भिन्न भिन्न गति होरी है , कोई पितृ बनता है कोई देवता बन जाता है , कोई प्रेत , हाथी चीटी , पेड़ आदि बनते है इन तक हमारे द्वारा दिया गया पिंड दान कैसे पहुचता है ।
इन प्रश्नों के उत्तर मार्कण्डेय पुराण ,वायु पुराण , श्राद्ध कल्पलता , और मनु स्मृति में सुस्पष्ट उत्तर दिय गया है की नाम गोत्र के सहारेविशवदेवएवं अग्निश्वत आदि दिव्य पितृ , हव्य कव्य को पितरो को प्राप्त करा देते है ।
ध्यान देने योग्य बात है ---- यदि पिता या कोई पूर्वज देव योनी को प्राप्त हो गया है तो आपके द्वारा दिया गया अन्न उसे वह पर अमृत होकर प्राप्त हो जाता है । मनुष्य योनी में अन्नके रूप में, आध्यत्मिक उन्नति के रूप में ,पशु योनी में तरण के रूप में, नाग योनी में वायु रूप में , यक्ष योनी में पान के रूप में , तथा एनी योनी में भी उसका भोज्य पदार्थ बनकर उसे प्राप्त हो जाता है । नम गोत्र उचित संकल्प और श्राद्ध से दिया गयापदार्थ भक्ति पूर्वक उच्चारित मन्त्र उनको पहुंचा देता है । जिव चाहे अनेको योनियों को पारकर गया हो तो भी तृप्ति उस तक पहुंच ही जाती है ।
मनु स्मृति में लिखा है ---की पितृ अंतरिक्ष में वायवीय शरीर से रहते है परन्तु पितृ पक्ष में ये मनोजीवी हो जाते है और स्मरण मात्र से ही श्राद्ध देश में आ जाते है और ब्राह्मण के मुख से भोजन कर तृप्त हो जाते है ।अगर आप श्राद्ध करने में समर्थ नही है तो कमसे कम गे को घास ही खिला दे पितरो के नाम पर .पर करे जरुर ।
जबाली सत्कम में -- महर्षि जबाली ने लिख है की जो पितृ पक्ष में पितरो को तृप्त करते है उन्हें पुत्र , आयु, आरोग्य , अतुल एश्वर्यऔर सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।
तीर्थ भूमि पर श्राद्ध ---पितरो में मिलन के बाद सरे पितरो का श्राद्धपितृ पक्ष में गया जाकर विधि विधान से जरुर करनाचाहिए ।
श्री मद देवी भागवत में लिखा है की जो पुत्र अपने पितरो को गया में पिंड दान देता है , उसी का पुत्रत्व सार्थक है ।
बदरी नारायण क्षेत्र में "ब्रह्म कपाली " नामक सिहं पर भीपिंड दान का बडा महत्व है । गया में पिंड दान के बादयहाँ पिंड दान करना चाहिए । पुष्कर तीर्थ में भी पिंड दान का महत्व है ।
सभी तीर्थों में जाकर पितरो को तर्पण करना चाहिए .
श्राद्ध में चांदी का बहुत महत्व है अगर चांदी के पात्र दे केवल जल मात्र ही दिया पितरो को दिया जाए तो वो अक्षय तृप्ति करक होता है। अथ हो सके तो चांदी का पात्र उपयोग में ले ।
चांदी का उद्भव शिव जी के नेत्रों से हुआ है अथ वः पवित्र है और देवो तथा पितरो को प्रिय है । ९(मत्स्य पुराण से ) ॐ जय माँ सोलह संस्कार पुरे हुए ।
श्राद्ध में लोहे का पात्र मना है ।

Monday, June 15, 2009

मेलन यानि की मृत प्राणी को पितरों में मिलाना

मरने के बाद प्राणी को पितरो के साथ मिला दिया जाता है यह जरूरी है । जब तक मिलन नही किया जाता तब तक मृत प्राणी अपने मृत पूर्वजों से नही मिल सकता ।( यज्ञं ० स्म्र० से )
अतः मृतक को श्राद्ध द्वारा पिता में , पितामह में , फ़िर प्रपितामह में मेलन कराया जाता है ।
अगर मृतक स्त्री है और उसका पति जीवित है , तोउसका मेलन सास , परसासऔर वृद्ध परसास में होगा ।
अगर पति जीवित नही है तो स्त्री प्रेत का मेलन पति , श्वसुर और प्रश्वसुर में होगा ।
साधारण श्राद्ध ------हर किसी को श्राद्ध करना आवश्यक है । हमारे किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहिले पितरों की पूजा होती है । पितरो का हमसे सीधा सम्बन्ध है , पितृरों की आशा केवल अपने परिवार से होती है .बाकि दुनिया से नही। जिस परिवार से पितृ खुश रहते है वः सदा फुला फलता है । हमेशा उन्नति करते है । जिनके पितृ दुखी , उपेक्षित रहते है वे सदा दुखी , दरिद्री ,रोगी रहते है ।
पितृ पक्ष---- पितृ पक्ष मेंपितृ लोक के दरवाजे खुलते है और पितृ इस धरती की ओर दौड़ पड़ते है , ये मेरे बेटे , पोते , बहु ,बीबी भाई है सम्बन्धी है वः अपना हर भरा परिवार देख क्र भुत खुश होते है । (मनु स्मृति से )
इस समय पितृ पक्ष के १५ दिन तक पितृ लोक के द्वार बंद रहते है और ये प्रथ्वी पर ही भूखे प्यासे धूमते है और अपने परिवार की ओर आशा लगाये रहते है की वःहमे यद् करे हमको खाना दे ।।
करने योग्य ---- घर में बनने वाले भोजन में से पहिला भोग भगवान को लगता है , परन्तु पितृ पक्ष में पहिले ग्रास पर पितृ का अधिकार होता है अतः घर की महिला को
हाही की वह स्नान करके भोजन बनाये जो भो बनाये उसेपक जाने पर , गैस चूल्हे से निचे उतरने के पहिले एक थाली में पितरों के नाम से एक चम्मच भोजन निकल ले । इसी प्रकार जो जो बने वः सभी निकल कर घर के किसी एकांत स्थान पर rkh ले साथ में एक गिलास पानी भी ले और जो भी श्रधा हो सब एक थाली में रख ले दो अगरवत्ती जला ले ओर दक्षिण की और मुह करके अपने पितरो को भोग लगाये , बसी श्रधा से उनको याद करे। अपनी समस्या खे उनकी यद् करे। उनकी कमी को महसूस करे उन से अपने दिल की बात कहें क्योकि वः आपके अपने है । आपने उनको देखा है , उनने आपको बहुत कुछ किया है । उनको आपसे लगाव है । बच्चे भले ही अपने बुजुर्गो को भूल जाए पर वो नही भूलते । एक घंटे बाद वः सब किसी गे को खिला दे । और क्षय तिथि को या अमावश्या को बिदाई दे दे
जो परिवार पितरों को मानते है उन्हें वः आर्शीवाद देकर जाते है , जो परिवार नही मानते उनको वः श्राप दे क्र जाते है .इसे लोग जीवन भर दुखी रहते है ।
अतः हमको श्राद्ध पक्ष में पितरो की क्षय तिथि को श्राद्ध जरुर करना चाहिए । अगर क्षय तिथि मालूम न हो तो अमावश्या के दिन अपने सभी पितरो के लिए क्ष्रद करना चाहिए । आप एक ही ब्राह्मण को भोजन करा क्र श्राद्ध पूर्ण क्र सकते है याआप अपने पितरो के नम पर कच्चे अन्न का संकल्प करके दान क्र सकते है ।
देवता अग्नि के मुखसे और पितृ ब्राह्मण के मुख से हव्य ग्रहण करते है ।( पद्म पुराण )
श्राद्ध की विधि ----- क्षय तिथि को या अमावश्या को शुद्ध सात्विक भोजन बनाये ।खीर जरुर बनाये । भोजन बन जाने पर एक थाली में पञ्च पलाश के पत्ते या दोना रख ले और जो भी बना है थोड़ा थोड़ा उनमे निकल ले और दक्षिण की की और मुह करके बैठ जाए हाथ में जल लेकर मन्त्र बोले या गोभ्यो नमः बोलकर पहिले दोना में जल छोड़ दे । श्वनेभ्यो नमः से दुसरे पर नमः से काकेभ्यो नमः से तीसरे पर , देवादिभ्यो नमः से चोथे पर और पिपीलिकादिभ्योनमः ( चींटी आदि ) से पांचवे दोना पर जल छोडे । इस प्रकार ये निकलनेके बाद ब्राह्मण के लिए थाली में भोजन निकले और हाथ में तिल और जल लेकर ब्राह्मण भोजन सहित पितृ देवता तृप्तिपर्यन्तं
eसा कहकर पितृ तीर्थ से जल छोडे । उर अपने पितरो को बिदाई दे की हे पितृ आप अपने लोक में जाकर सुख से रही हम पर कृपा बनाये रखीये ।( अन्त्य कर्म प्रकाश )
इसके बाद एक या जो भी हो सके ब्राह्मण को भोजन कराए और दक्षिण दान करे । अन्न वस्त्र या जो भी हो ।

Saturday, June 13, 2009

एकादशः के कृत्य

दस गात्र के बाद घर से छुतक समाप्त हो जाती है। इसके बाद एकदश क्रेत्यहोते है जिसे कोई द्व्द्शी या त्रयोदशी को करता है । ये अपने देश कल के रिवाज के अनुसार होता है ।ये सभी पूजन अपनी सामर्थ्य के हिसाब से करना चाहिए .
इसम दिन निम्न कार्य करना चाहिए । ( ये सभी कार्य पंडित जी के बताए अनुसार करना चाहिए । )
१`----नारायण बली ।
२ -----मध्यम षोडशी ।
३-----आद्यश्राद
४-----प्रेत शय्या दान , विविध दान तथा उदकुम्भ दान ।
५----- वृषोत्सर्ग ।
६------संक्षिप्त वैतरणी गोदान ।
७-----उत्तम षोडशी ।
इसके बाद हर महीने म्रत्यु तिथि या क्षय तिथि पर पिंड दान करना चाहिए इसे मासिक श्राद कहते है । मासिक श्राद्ध मरने के एक साल तक ही होता है । हर माह सम्भव न हो तो एक वर्ष में श्राद्ध करना चाहिए ।
वार्षिक श्राद्ध ------vजिसे बरसी या बर्सिक श्राद्ध कहते है ।
मृतक के निमित्त श्रधा पूर्वक किए जाने वाले पिंड दान या दान धर्म को ही श्राद्ध कहते है ।
माता पिता की क्षय तिथि पर यह श्राद्ध करना चाहिय
ब्रह्म पुराण के अनुसार दोपहर १० बजकर ४८ मिनिट से लेकर १ बजकर १२ मिनिट तक करना चाहिए ।
इस क्श्रध में एक ही पिंड दान होता है । अगर ब्राह्मण नही बुलाना है तो खीर का पिंड बनाकर पितृर को अर्पण करे और ज्यादा नही तो एक ब्राह्मण को भोजन कराए यदि सौभग्य वती स्त्री का क्श्रध किया जा रहा है तो सौभाग्यवती ब्राह्मणी को भोजन करे ।



Friday, June 12, 2009

दस दिन के पिंड का विधान

द्स्गात्र के पहिले दिन जिस अन्न से पिंड दान करे दस दिन तक उसी अन्न से पिंड दान देना चाहिए ।
पिंड दान रोज देना चाहिए सम्भव न हो तो ,तीसरे दिन तीन , पांचवें दिन दो , सातवें दिन दो , नवे दिन दो ओर दसवे दिन एक देना चाहिए ।
जो ये भी न क्र सके तो दसवे दिन दसों पिंड का दान एक साथ करे । पर करे जरुर ॥
माता पिता के अतिरिक्त किसी एनी सम्बन्धी का दस गात्र हो रहा हो और बिच में अमावश्या आ जाए तो उसी दिन द्सगात्र के दस पिंड दान क्र दे । ध्यान रहे माता पिता केलिए अमावश्या आने से कोई फर्क नही उन्हें दस दिन तक पुरे दस पिंड दान करे । ( अन्त्य कर्म दीपक से ) ।
पिंड दान सामग्री -----गंगाजल मिक्स जल, पलाश के पत्ते , दोना ,अगरबत्ती , घी की बत्ती ,गे का दूध ५० ग्राम प्रति दिन , चीनी , गे के दूध में बनी खीर या जो का आटापिंड बनाने को , कुश २५ नग , तिल २०० ग्राम , मधु ५० ग्राम , दिया जलाने को तेल तिल का , आसन , घी, सुपारी १० , पान१० , सफेद ऊर्ण सूत्र १ मीटर ,भ्रन्गराजप्रे १०० ग्राम , खस १००ग्रम , चावल १किलो , और मीठा।
प्रथम पिंड दान -----पूर्व की ओर मुख करके बैठे सामने तेल का दीपक जला ले , दो कुशों की पवित्री दाहिने हाथ की अनामिका में और तिन कुशों की बाएं हाथ की अनामिका में पहिने और केशवाय नम , नारायणआय नमः , माधवाय नमः , से आचमन करे । फ़िर अंगूठे से मुख ,नाक ,कण आँख ,ह्रदय तथा नाभि का स्पर्श करे ।
अपने उपर तथा सामग्री के उपर लज छिडके बाये हाथ में पिली सरसों लेकर दये हाथ से बंद करले भगवान का ध्यान करके चारो दिशा में डाले । ( यह सभी कार्य पंडित की देख रेख में करे ) ।
एक चोकी या वेदी बनाये फ़िर दूध घी मधु से सिक्त खीर या जो के आटा से पिंड बनाये । उसे इत्र्हुश तिल जल सहितदोना से डंक कर हाथ में लेकर प्रथम दिन के दान का स्नाक्ल्प बोले फ़िर बाएं हाथ की सहायता से दये हाथ के पितृ तीर्थ ( अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग को पितृ तीर्थ कहते है ) से वेदी के बिच कुशों पर स्थित करे ।
फ़िर पिंड का पूजन करके धुप दीप नेवेद्य आदि , तर्पण आदि जो भी पंडित जी बताये करना चाहिए ।
इसी तरह एक एक करके पुरे दस दिन तक करना चाहिए ।
कर्म की सम्पूर्णता के लिए भगवान से प्राथना करे।
पिंड प्रक्षेप -----पिंड दान के बाद दीपक बुझा दे ( बच्चों को ये कृत्य न दिखाए )पिंड तथा पूजा में उपयोग की गी साडी सामग्री ( कुश को छोड़ कर ) नदी अथवा जलाशय मेंबहा दे या गाय को खिला दे बेदी को मिटा दे ।